Sarangarh-Bilaigarh; Blacklisted doctors receive administrative protection, less treatment, more training for patients; the Clinical Establishment Act bows before the fearless messengers of death.,,
प्रमुख बिंदु :-
___स्वास्थ्य के नाम पर ‘सफेदपोश यमदूतों’ का साम्राज्य चिकित्सा जगत शर्मसार,,,
___इंसानी जिंदगियों पर ‘प्रैक्टिकल’: झोलाछापों के लिए ‘प्रायोगिक चूहा’ बने मजबूर मरीज, यूनानी विभाग की ब्लैकलिस्ट के बाद भी स्वास्थ्य अमले का खौफनाक मौन,,,
___इलाज के नाम पर चल रहा डॉक्टरी का ककहरा सीखने का खेल; पोर्टेबल एक्स-रे और सोनोग्राफी मशीनों से सरेआम खिलवाड़, कार्रवाई के बजाय फाइलों में धूल खा रही फर्जी डॉक्टरों की सूची,,,
___संविधान के अनुच्छेद 21 की सरेआम धज्जियां:अनाड़ियों के हाथों में सौंप दी गई जनता की सांसें, यूनानी विभाग के दावों को ठेंगा दिखा रहे फर्जी डॉक्टर,,,
सारंगढ़-बिलाईगढ़ :- छत्तीसगढ़ के नवनिर्मित जिले सारंगढ़-बिलाईगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक ईमानदारी पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है। जिला मुख्यालय से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों तक चिकित्सा के नाम पर जो खौफनाक खेल खेला जा रहा है, उसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। जिले में कुकुरमुत्ते की तरह खुले अवैध क्लीनिक न केवल लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं, बल्कि बिना योग्यता और पंजीयन के एक समानांतर और जानलेवा स्वास्थ्य व्यवस्था चला रहे हैं।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि इस पूरे काले साम्राज्य की मुकम्मल जानकारी जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMHO), विकासखंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) और स्थानीय प्रशासन के संज्ञान में है। इसके बावजूद, जिम्मेदार अधिकारियों का इस कदर मौन रहना यह साफ गवाही देता है कि सिस्टम के भीतर बैठे कुछ रसूखदार सफेदपोशों की शह पर ही इन अवैध डॉक्टरों की दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं।

परत दर परत खुलासा: इलाज कम, इंसानी जिंदगियों पर ‘प्रशिक्षण’ ज्यादा :-
इस पूरे गोरखधंधे की सबसे खौफनाक और रूह कंपा देने वाली सच्चाई यह है कि ये फर्जी डॉक्टर मरीजों का इलाज कम करते हैं, बल्कि उन पर डॉक्टरी का ‘प्रशिक्षण’ (सीखने का काम) ज्यादा करते हैं।
1. मासूम जनता बनी ‘प्रायोगिक चूहा’:-
चूंकि इन तथाकथित डॉक्टरों के पास कोई वैध मेडिकल डिग्री या ट्रेनिंग नहीं होती, इसलिए ये क्लीनिक में आने वाले भोले-भाले ग्रामीण मरीजों को ‘प्रायोगिक चूहा’ समझ लेते हैं। नस खोजना हो, बोतल चढ़ाना हो, टांके लगाने हों या फिर गंभीर इंजेक्शन देना हो—ये झोलाछाप बिना किसी ज्ञान के मरीजों के शरीर पर हाथ आजमाते हैं और ककहरा सीखते हैं। इनके इस “सीखने-सिखाने” के चक्कर में न जाने कितने मरीजों की नसें ब्लॉक हो जाती हैं, गलत दाद-खाज के इलाज में चमड़ी सड़ जाती है, और अंततः लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है।
2. अवैध गर्भपात और खतरनाक लाइफ सपोर्ट का खेल:-
सूत्रों के मुताबिक, इन फर्जी क्लीनिकों के बंद कमरों में धड़ल्ले से अवैध गर्भपात का काला कारोबार संचालित होता है। बिना किसी सर्जिकल विशेषज्ञता के, ये झोलाछाप डॉक्टर केवल ‘तुक्के’ और ‘अनुमान’ के आधार पर महिलाओं की जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन टेबल पर बैठ जाते हैं और सर्जरी करना “सीखते” हैं। जब स्थिति पूरी तरह बिगड़ जाती है और मरीज तड़पने लगता है, तब अपनी खाल बचाने के लिए उसे आनन-फानन में अन्य राज्यों या बड़े निजी अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है, और अधिकांश मामलों में मासूम जिंदगियां रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं।
3. आधुनिक और अवैध उपकरणों का दुरुपयोग :-
जिले के बिलाईगढ़, सारंगढ़, सरसींवा, भटगांव और सलीआर जैसे इलाकों में सक्रिय इन डॉक्टरों के हौसले इतने बुलंद हैं कि ये अपनी दुकानों में बड़े-बड़े आधुनिक और अवैध डॉक्टरी उपकरण (जैसे पोर्टेबल एक्स-रे, सोनोग्राफी मशीनें और अवैध पैथोलॉजी लैब) लगाकर बैठे हैं। इन तकनीकी मशीनों को चलाने का कोई सर्टिफिकेट न होने के बावजूद, ये केवल अनुमान के आधार पर रिपोर्ट तैयार करते हैं और गलत डायग्नोसिस कर मरीजों को मौत के मुहाने पर धकेल देते हैं।
बड़ा दस्तावेज: यूनानी विभाग की ‘ब्लैकलिस्ट’ को रद्दी का टुकड़ा समझकर ठेंगा दिखा रहे झोलाछाप :-
यह कोई हवा-हवाई आरोप नहीं है कि प्रशासन को इसकी खबर नहीं है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक विरोधाभास और ढोंग तब उजागर होता है, जब हम अतीत के पन्नों को पलटते हैं।
दस्तावेजी सबूत: कुछ समय पूर्व जिला यूनानी व आयुर्वेद चिकित्सा विभाग द्वारा जिले में सक्रिय फर्जी क्लीनिकों और बिना योग्यता के यूनानी/आयुर्वेदिक पद्धतियों की आड़ में एलोपैथिक इलाज करने वाले झोलाछाप डॉक्टरों की एक बाकायदा ‘आधिकारिक ब्लैकलिस्ट (सूची)’ जारी की गई थी। इस सूची में दर्जनों ऐसे डॉक्टरों और क्लीनिकों के नाम, पते और उनके द्वारा किए जा रहे फर्जीवाड़े का पूरा ब्यौरा दर्ज था।
कागजों पर कार्रवाई, जमीन पर खुली छूट:-
कागजी नियमों के अनुसार उस सूची के जारी होने के तुरंत बाद इन सभी फर्जी क्लीनिकों को सील किया जाना था और संबंधित जालसाजों को सलाखों के पीछे भेजा जाना था। लेकिन सारंगढ़-बिलाईगढ़ के स्वास्थ्य विभाग का रवैया देखिए—वह सूची आज भी सरकारी फाइलों में धूल खा रही है। जिन डॉक्टरों को खुद सरकारी विभाग ने ‘फर्जी’ और ‘अवैध’ घोषित किया था, वे आज पहले से भी ज्यादा ठाट-बात और बेखौफ अंदाज में अपनी दुकानें चला रहे हैं। क्या यह सीधे तौर पर कानून का मखौल उड़ाना नहीं है? क्या यह साबित नहीं करता कि यूनानी विभाग की वह लिस्ट सिर्फ दिखावे के लिए थी, ताकि जनता की आंखों में धूल झोंकी जा सके?
देशभर की मिसालें: जब-जब फूटा फर्जी क्लीनिकों का भंडाफोड़:-
सारंगढ़-बिलाईगढ़ की यह भयावह स्थिति कोई पहली घटना नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में जब प्रशासन ने अपनी आंखें मूंदीं, तो इसी तरह इंसानी जिंदगियों पर प्रैक्टिकल करने वाले गिरोहों का साम्राज्य स्थापित हुआ, जिसके बाद न्यायपालिका और पुलिस को कड़े कदम उठाने पड़े:
1. हापुड़ और मेरठ (उत्तर प्रदेश) का नर्सिंग होम कांड: उत्तर प्रदेश के मेरठ और हापुड़ जिलों में इलाज की आड़ में चल रहे अवैध नर्सिंग होम और क्लीनिकों पर जब छापेमारी हुई, तो वहां बड़े पैमाने पर बिना पंजीकरण के चल रहे ऑपरेशन और अवैध चिकित्सा पद्धतियों का खुलासा हुआ था। वहां हाईकोर्ट के कड़े रुख के कारण दर्जनों क्लीनिकों को ध्वस्त किया गया और दोषी स्वास्थ्य अधिकारियों पर निलंबन की गाज गिरी।
2. मुंबई (महाराष्ट्र) का झोलाछाप विरोधी अभियान: मुंबई के उपनगरीय इलाकों (जैसे गोवंडी और मानखुर्द) में पुलिस और बीएमसी (BMC) की संयुक्त विंग ने ‘बोगस डॉक्टर्स’ के खिलाफ मकोका (MCOCA) जैसी सख्त धाराओं के तहत कार्रवाई की थी। वहां भी इन अवैध क्लीनिकों का इस्तेमाल मरीजों पर गलत दवाइयों के ट्रायल और नकली दवाइयां बेचने के लिए किया जा रहा था।
3. गुरुग्राम (हरियाणा) का अवैध लिंग परीक्षण रैकेट: हरियाणा के गुरुग्राम में स्वास्थ्य विभाग और सीएम फ्लाइंग स्क्वाड ने जब कई फर्जी क्लीनिकों पर तड़के छापेमारी की, तो वहां पोर्टेबल सोनोग्राफी मशीनों के जरिए अवैध लिंग परीक्षण (पीसीपीएनडीटी एक्ट का उल्लंघन) किए जाने का भंडाफोड़ हुआ था, जिसके बाद आरोपियों को सीधे जेल भेजा गया।
संवैधानिक और कानूनी प्रावधान: अफसरों के पास असीमित अधिकार, फिर भी मौन क्यों :-
भारत का संविधान और देश की दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता – BNS) नागरिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की पूरी गारंटी देती है। ऐसे में सारंगढ़-बिलाईगढ़ के स्वास्थ्य विभाग की निष्क्रियता सीधे तौर पर संवैधानिक कर्तव्यों का उल्लंघन है:
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार):- सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट किया है कि ‘जीने के अधिकार’ में ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ भी शामिल है। किसी भी नागरिक को किसी अयोग्य या फर्जी डॉक्टर से इलाज कराकर अपनी जान जोखिम में डालने के लिए मजबूर करना या प्रशासन द्वारा ऐसे तत्वों को खुली छूट देना, अनुच्छेद 21 का सरेआम हनन है।
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट (सख्त नियम):- इस कानून के तहत बिना वैध पंजीकरण के कोई भी चिकित्सा केंद्र नहीं चलाया जा सकता। अवैध उपकरण (जैसे एक्स-रे, सोनोग्राफी) पाए जाने पर उपकरणों को जब्त करने और संबंधित व्यक्ति को न्यूनतम 3 से 5 वर्ष की जेल की सजा का प्रावधान है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं:- बिना डिग्री के इलाज करना, स्वयं को डॉक्टर बताना और लोगों को गुमराह करना सीधे तौर पर धोखाधड़ी (Cheating) और मानव जीवन को जानबूझकर संकट में डालने का गंभीर आपराधिक कृत्य है।
साहब… यह लापरवाही है, लाचारी है या फिर मोटी मंथली :-
इस पूरे मामले में जिला चिकित्सा अधिकारी (CMHO) और विकासखंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध और कटघरे में है। जब देश के कानून और संविधान ने इन अधिकारियों को अपराधियों को जेल भेजने की असीमित शक्तियां दी हैं, तो फिर सारंगढ़-बिलाईगढ़ का अमला हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठा है?
रहस्यमयी खामोशी के मायने: जब मीडिया और स्थानीय जागरूक नागरिकों द्वारा समय-समय पर इन अवैध क्लीनिकों की शिकायतें अधिकारियों के टेबल तक पहुंचाई जाती हैं, तो फाइलें आगे क्यों नहीं बढ़तीं? आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी या ‘अदृश्य धागा’ है जो इन जिम्मेदार अफसरों के हाथों को बांधे रखता है?
दिखावे की सील-बंदी का खेल: कभी-कभार जब जनता का आक्रोश चरम पर होता है या मीडिया का दबाव बढ़ता है, तो स्वास्थ्य विभाग की टीम एक-दो क्लीनिकों पर दिखावे की छापामार कार्रवाई करती है। दुकान को सील किया जाता है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि वही क्लीनिक दो दिन बाद फिर से खुल जाता है। यह सील खोलने और बंद करने का खेल किस प्रशासनिक साठगांठ के तहत चलता है, यह अब जिले की आम जनता भी अच्छे से समझने लगी है।
तीखे सवाल: जवाब तो देना ही होगा :-
1. माननीय मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री जी से सवाल: क्या सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले को आपने झोलाछापों के हवाले कर दिया है? क्या यहां के नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य का कोई मूल्य नहीं है, जो उन्हें इन अनाड़ियों के हाथों ‘सीखने’ के लिए छोड़ दिया गया है?
2. जिला कलेक्टर और एसपी से सवाल: जब जिले के भीतर चिकित्सा के नाम पर इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा, अवैध उपकरणों का खेल और इंसानी जानों पर प्रैक्टिकल चल रहा है, तो प्रशासन अब तक स्वतः संज्ञान लेकर इन अड्डों को स्थायी रूप से बंद क्यों नहीं करा रहा है?
3. CMHO और BMO से सवाल: यूनानी विभाग द्वारा जारी की गई फर्जी डॉक्टरों की सूची पर अब तक पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं कराई गई? क्या आपकी खामोशी को इन अपराधियों को दिया गया ‘मौन समर्थन’ न माना जाए?
अब आर-पार की लड़ाई का वक्त :-
चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे को जिस तरह से सारंगढ़-बिलाईगढ़ में कलंकित किया जा रहा है, वह बेहद घृणास्पद और अक्षम्य है। मरीजों को इलाज के नाम पर मौत के कुएं में धकेलना और उन पर डॉक्टरी का ककहरा सीखना सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों और जनता के विश्वास की सरेआम हत्या है। यदि शासन-प्रशासन ने इस विस्तृत रिपोर्ट के बाद भी अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं तोड़ी, तो वह दिन दूर नहीं जब जिले की आक्रोशित जनता खुद सड़कों पर उतरकर इन अवैध अड्डों और भ्रष्ट अधिकारियों के दफ्तरों का घेराव करने को मजबूर होगी। जनता को खोखले आश्वासन या जांच कमेटियों का नाटक नहीं चाहिए; उसे इन ‘मौत के सौदागरों’ की जेल के भीतर रवानगी और लापरवाह जिम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल और कठोर दंडात्मक कार्रवाई चाहिए।
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️भ्रष्ट्राचारियों को,,,
✍️जब तक तोड़ेंगे नहीं 📝तब तक छोड़ेंगे नहीं✍️
✍️कलम का बादशाह✍️
