आज 14 जून को संपूर्ण भारत वर्ष में मनाई गई कबीर दास जयंती,,,,,

संत कबीर, जिन्हें कबीर दास या कबीर साहेब के नाम से भी जाना जाता है की जयंती इस साल 14 जून को मनाई जा रही है। उनका जन्म ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ था। यही वजह है कि हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ही उनकी जयंती मनाई जाती है। कबीरदास भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज की बुराइयों को दूर करने में लगा दिया। दोहे के रूप में उनकी रचनाएं आज भी गायी जाती हैं। कबीर दास जी का जन्म काशी में 1398 में हुआ था, जबकि उनका निधन 1518 में मगहर में हुआ था।

कबीर दास ने अपने दोहों, विचारों और जीवनवृत्त के माध्यम से मध्यकालीन भारत के सामाजिक और धार्मिक, आध्यात्मिक जीवन में क्रांति का सूत्रपात किया था। उन्होंने हमेशा तत्कालीन समाज के अंधविश्वास, रूढ़िवाद, पाखण्ड का घोर विरोध किया। उन्होनें उस काल में भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों और समाज के मेल-जोल का मार्ग दिखाया। हिंदू, इस्लाम सभी धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और पाखण्डों पर कड़ा प्रहार किया।

एक ओर वो इस्लाम में अज़ान का विरोध करते हुए कहते हैं कि.,,,,
कंकर पत्थर जोड़ कर मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।


और दूसरी ओर हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा का विरोध करते हुए कहते हैं कि.,,,,
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार, वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार।।
कबीरदास ने जात-पात, समाजिक भेद-भाव का भी जम कर विरोध किया.,,,
हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना, आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

कबीर दास सिर्फ एक समाज सुधारक ही नहीं बल्कि, वे आध्यात्मिक रहस्यवाद के उच्चकोटी के कवि और संत भी थे..,,,
‘सांच बराबरि तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हिरदै साँच है, ताकै हृदय आप॥”

समाज को समानता, सेवा, आपसी सौहार्द और प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले संत कबीर दास जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।

पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

कबीर दास जी कहते हैं कि हमारे पास समय बहुत कम है, जो काम कल करना है वो आज करो, और जो आज करना है वो अभी करो, क्यों कि पता नहीं कब या हो जाए।
दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।

जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय॥

कबीर जी इस दोहे में कहते हैं कि दुःख में हर इंसान ईश्वर को याद करता है लेकिन सुख में हर कोई ईश्वर को भूल जाता है। इसलिए अगर सुख में भी ईश्वर को याद करो तो दुख कभी पास में फटकेगा ही नहीं।
मैं जानूं मन मरि गया, मरि के हुआ भूत |

मूये पीछे उठि लगा, ऐसा मेरा पूत ||

इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि भूलवश मैंने जाना था कि मेरा मन भर गया, किंतु वह तो मरकर प्रेत हुआ। मरने के बाद भी उठकर मेरे पीछे लग पड़ा, ऐसा यह मेरा मन बालक की तरह है।
शब्द विचारी जो चले, गुरुमुख होय निहाल |

काम क्रोध व्यापै नहीं, कबूँ न ग्रासै काल ||

इस दोहे का अर्थ है कि गुरुमुख शब्दों का विचार करके आचरण करता है वह हमेशा के लिए कृतार्थ हो जाता है। उसको किसी भी तरह के काम क्रोध नहीं सताते और वह कभी मन कल्पनाओं के मुख में नहीं पड़ता।

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई

सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।

कबीर दास की इस दोहे के माध्यम से कहते हैं कि शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है। यदि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियां सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।

”जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी।

फूटा कुम्भ जल जलहि समाना, यह तत सुनहु गियानी।।

संत कबीर दास ने समाज में स्वर्ग और नर्क को लेकर कायम मिथकों को तोड़ने के लिए एक बड़ी मिसाल पेश की। अपना पूरा जीवन काशी में बिताने वाले कबीर दास ने अपने आखिरी वक्त के लिए एक ऐसी जगह को चुना, जिसे लेकर उन दिनों अंधविश्वास बना हुआ था कि उस जगह जो व्यक्ति मरता है वो नरक में जाता है। कबीर दास जी ने लोगों को इस भ्रम को तोड़ने के लिए अपना आखिरी समय मगहर में बिताया, जो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के पास स्थित एक जगहा है। उन्होंने वहीं पर अपना देह त्यागा।

भ्रष्ट्राचारियो को,,,,
जब तक तोड़ेंगे नही, तब तक छोड़ेंगे नही

कलम का बादशाह✍️

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