अवैध कब्जाधारी सरपंच के द्वारा अन्य चार कब्जाधारियों को दिया जा रहा संरक्षण,,,

The illegal occupant Sarpanch is providing protection to four other occupants.,,,

सारंगढ़-बिलाईगढ़-बरमकेला :- ग्राम पंचायत गोबरसिंहा में जमीन विवाद का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। तहसीलदार सरिया द्वारा ग्राम के चार अवैध कब्जाधारियों को बेदखली नोटिस जारी किए जाने के बाद अब पंचायत के सरपंच उज्ज्वल मिरी पर प्रशासनिक कार्यवाही को रोकने की मांग कर शासन-प्रशासन को गुमराह करने का गंभीर आरोप लगा है।

The illegal occupant Sarpanch is providing protection to four other occupants.

मामले की शुरुआत तब हुई :- जब तहसीलदार सरिया कार्यालय से ग्राम गोबरसिंहा के कुछ व्यक्तियों के विरुद्ध सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर बेदखली आदेश जारी किया गया। प्रशासन द्वारा जारी आदेश के बाद यह अपेक्षा की जा रही थी कि पंचायत प्रशासन इस कार्रवाई में सहयोग करेगा और ग्राम में शासन की नीतियों का पालन सुनिश्चित करेगा। परंतु इसके विपरीत सरपंच उज्ज्वल मिरी ने जिला कलेक्टर बिलाईगढ़ को पत्र भेजकर तहसीलदार द्वारा की जा रही बेदखली की कार्यवाही को “स्थगित” करने की मांग कर दी।

पत्र में सरपंच ने दावा किया है कि :- उक्त भूमि विवादित है और मामला न्यायालय में लंबित है, इसलिए बेदखली की कार्रवाई रोक दी जाए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित व्यक्तियों के घर लंबे समय से बने हुए हैं और कार्रवाई से ग्राम में असंतोष फैल सकता है।

लेकिन दूसरी ओर, ग्रामवासियों का कहना है कि :- सरपंच उज्ज्वल मिरी स्वयं भी उसी भूमि क्षेत्र में वर्षों से कब्जाधारी हैं, और इसी कारण वे प्रशासनिक कार्रवाई को रोकने के प्रयास में लगे हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं ताकि खुद का और अन्य कब्जाधारियों का कब्जा बरकरार रहे।

ग्रामीणों के अनुसार :- तहसीलदार सरिया की ओर से जारी बेदखली नोटिस बिल्कुल वैधानिक प्रक्रिया के तहत जारी हुआ था। भूमि राजस्व अभिलेखों के अनुसार वह जमीन शासन की है और उस पर निजी निर्माण पूर्णतः अवैध है। इसके बावजूद सरपंच द्वारा इस कार्रवाई को “गांव में शांति भंग होने” का बहाना बनाकर रोकने की सिफारिश करना, उनकी नीयत पर सवाल खड़े करता है।

कानूनी दृष्टि से भी :- पंचायत राज अधिनियम 1993 की धारा 56 के तहत ग्राम पंचायत को सार्वजनिक मार्गों और शासकीय भूमि पर किसी भी प्रकार के अवैध निर्माण को रोकने का दायित्व सौंपा गया है। ऐसी स्थिति में, सरपंच का कार्य होना चाहिए था कि वे तहसील प्रशासन का सहयोग करें, न कि आदेश स्थगन की मांग करें।

वहीं पंचायत स्रोतों के अनुसार :- उज्ज्वल मिरी द्वारा प्रस्तुत आवेदन में यह कहा गया है कि “गांव में अशांति फैल सकती है,” किंतु इस दावे का कोई ठोस आधार नहीं दिया गया है। इसके उलट, कई ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हुई तो यही अशांति का कारण बनेगा, क्योंकि शासकीय भूमि पर वर्षों से कब्जा होने से गांव के विकास कार्यों पर भी रोक लगी हुई है।

जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि :- वे जनता और प्रशासन के बीच सेतु का कार्य करें और निष्पक्षता बनाए रखें। लेकिन जब वही जनप्रतिनिधि स्वयं विवादित भूमि पर कब्जा धारक हों, तो उनकी निष्ठा और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

स्थानीय ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि :- सरपंच उज्ज्वल मिरी द्वारा प्रस्तुत पत्र की गहराई से जांच की जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि क्या वास्तव में वे स्वयं अवैध कब्जे में शामिल हैं। यदि ऐसा पाया जाता है, तो उनके विरुद्ध विधिक कार्रवाई होनी चाहिए ताकि ग्राम पंचायत का संचालन निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो सके।

अंत में, यह मामला केवल एक गांव का नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है। शासन की भूमि पर कब्जा करने वालों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति न केवल कानून के विरुद्ध है, बल्कि ग्राम के विकास और सामाजिक सौहार्द के लिए भी खतरा है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या वास्तव में कानून के सामने सब बराबर हैं, यह साबित करता है या नहीं।

✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️भ्रष्ट्राचारियों को,,,
✍️जब तक तोड़ेंगे नहीं 📝तब तक छोड़ेंगे नहीं✍️

✍️कलम का बादशाह✍️

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